लेबनान पर इजराइली हमलों के बीच ईरानी विदेश मंत्री का पाक सेना प्रमुख को फोन और उसके मायने

लेबनान पर इजराइली हमलों के बीच ईरानी विदेश मंत्री का पाक सेना प्रमुख को फोन और उसके मायने

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को फोन किया है। ये कोई सामान्य शिष्टाचार भेंट वाली कॉल नहीं थी। लेबनान में इजराइल के बढ़ते हमलों और हिजबुल्लाह के खिलाफ छिड़ी जंग के बीच तेहरान से रावलपिंडी तक हुई इस बातचीत ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जब मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) बारूद के ढेर पर बैठा हो, तब ईरान का पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व से संपर्क साधना साफ संकेत देता है कि समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।

ईरान इस वक्त चारों तरफ से दबाव में है। लेबनान में उसके सबसे भरोसेमंद सहयोगी हिजबुल्लाह को इजराइल ने भारी नुकसान पहुँचाया है। ईरान की अपनी सीमाएं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं। ऐसे में पाकिस्तान, जो एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है और जिसकी सेना का मुस्लिम जगत में बड़ा रसूख है, ईरान के लिए एक जरूरी खिलाड़ी बन जाता है।

इजराइली हमलों के बाद बदली हुई क्षेत्रीय स्थिति

इजराइल ने लेबनान में जो किया है, उसने ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' की कमर तोड़ने की कोशिश की है। पेजर धमाकों से लेकर नसरल्लाह की मौत तक, ईरान ने अपने सबसे कीमती मोहरों को खोया है। अराघची का जनरल मुनीर को फोन करना यह दिखाता है कि ईरान अब केवल कूटनीतिक रास्तों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। उसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भारी वजन वाले साथियों की जरूरत है।

पाकिस्तान के लिए यह स्थिति किसी कांटों की सेज से कम नहीं। एक तरफ ईरान उसका पड़ोसी है जिसके साथ सुरक्षा और सीमा प्रबंधन के पुराने मुद्दे रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देश हैं जिनसे पाकिस्तान के आर्थिक हित जुड़े हैं। जनरल मुनीर को किए गए इस फोन कॉल में मुख्य चर्चा क्षेत्रीय स्थिरता पर केंद्रित रही, लेकिन इसके पीछे की कहानी कहीं ज्यादा गहरी है।

ईरान चाहता है कि पाकिस्तान इस संकट की घड़ी में खुलकर उसके साथ खड़ा न सही, लेकिन कम से कम इजराइल और अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत रुख अपनाए। पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर लेबनान में इजराइली कार्रवाई की निंदा की है। हालांकि, ईरान इससे कहीं अधिक की उम्मीद लगाए बैठा है।

जनरल मुनीर और अराघची के बीच असल में क्या बात हुई

सरकारी बयानों में अक्सर 'द्विपक्षीय हितों' और 'क्षेत्रीय शांति' जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है। लेकिन हकीकत में ईरान ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। अराघची ने स्पष्ट किया कि इजराइल की आक्रामकता अब केवल लेबनान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र की संप्रभुता के लिए खतरा है।

ईरान की चिंता केवल लेबनान नहीं है। उसे डर है कि इजराइल की अगली हिट लिस्ट में उसके अपने परमाणु ठिकाने या सैन्य मुख्यालय हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो ईरान को पड़ोसी देशों की मदद की दरकार होगी। जनरल मुनीर ने शांति की अपील की, पर उन्होंने यह भी माना कि फिलिस्तीन और लेबनान में जो हो रहा है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पाकिस्तान की सेना के लिए ईरान के साथ संबंध सुधारना मजबूरी भी है और जरूरत भी। बलूचिस्तान सीमा पर होने वाली आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए दोनों देशों का एक पन्ने पर होना जरूरी है। ईरान इसी दुखती रग का इस्तेमाल करके पाकिस्तान को अपने पाले में करीब खींचने की कोशिश कर रहा है।

क्या पाकिस्तान इस जंग का हिस्सा बनेगा

ईमानदारी से कहूं तो पाकिस्तान के लिए सीधे तौर पर इस संघर्ष में कूदना आत्मघाती होगा। उनकी अर्थव्यवस्था पहले से ही वेंटिलेटर पर है। वो आईएमएफ (IMF) के कर्ज और सऊदी रियाल के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में ईरान के लिए अपनी सेना भेजना या खुलकर हथियार देना मुमकिन नहीं दिखता। लेकिन पाकिस्तान का 'मौन समर्थन' भी ईरान के लिए बड़ी बात है।

इजराइल के खिलाफ इस्लामी देशों का एक ब्लॉक बनाने की कोशिशें तेज हैं। ईरान जानता है कि अगर पाकिस्तान जैसा देश इस ब्लॉक का हिस्सा बनता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर दबाव बढ़ता है। अराघची ने इसी दबाव को बनाने के लिए फोन घुमाया था। उन्होंने पाकिस्तान को याद दिलाया कि मुस्लिम उम्माह की रक्षा करना केवल ईरान की जिम्मेदारी नहीं है।

यहाँ एक और बड़ा मोड़ है। पाकिस्तान की अपनी जनता में इजराइल विरोधी भावनाएं चरम पर हैं। जनरल मुनीर पर घरेलू दबाव भी है कि वो फिलिस्तीन और लेबनान के मुद्दे पर कुछ ठोस करें। ईरान इसी जनभावना का फायदा उठाना चाहता है।

क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर चर्चा के बहाने रणनीति

दोनों नेताओं के बीच बातचीत में आतंकवाद का मुद्दा भी उठा। ये थोड़ा अजीब लग सकता है कि जब लेबनान जल रहा हो तब ये लोग आतंकवाद की बात क्यों कर रहे हैं? असल में ईरान का मानना है कि इजराइल और उसके सहयोगी संगठन ईरान और पाकिस्तान की सीमाओं पर अस्थिरता पैदा कर रहे हैं। जैश अल-अदल जैसे समूहों का मुद्दा हमेशा से ईरान और पाकिस्तान के बीच तनाव का कारण रहा है।

अराघची ने पाकिस्तान को आश्वासन दिया है कि ईरान अपनी धरती का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं होने देगा। बदले में, वो पाकिस्तान से भी यही गारंटी चाहते हैं। ये लेन-देन वाली कूटनीति है। ईरान को अपनी पूर्वी सीमा पर शांति चाहिए ताकि वो पूरी ताकत के साथ पश्चिम में इजराइल का सामना कर सके।

पाकिस्तान की विदेश नीति का असली इम्तिहान

पाकिस्तान इस वक्त दुनिया के सबसे मुश्किल कूटनीतिक खेल का हिस्सा है। उसे चीन को खुश रखना है, अमेरिका से पैसे चाहिए, सऊदी अरब से तेल और ईरान से शांति। ईरान के विदेश मंत्री का फोन आना इस बात का सबूत है कि तेहरान अब पाकिस्तान को केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ढाल के रूप में देख रहा है।

इजराइल की बढ़ती ताकत ने ईरान को बेचैन कर दिया है। ये बेचैनी अराघची की आवाज में साफ झलकती है जब वो मुस्लिम देशों के सेना प्रमुखों से संपर्क करते हैं। पाकिस्तान की तरफ से जो प्रतिक्रिया आई है, वो काफी नपी-तुली है। उन्होंने सीधे तौर पर ईरान के पाले में जाने के बजाय 'सयंम' और 'यूएन चार्टर' की बात की है।

आगे का रास्ता और आपकी समझ

मध्य पूर्व का ये संकट थमता नहीं दिख रहा। ईरान आने वाले दिनों में अपनी कूटनीतिक सक्रियता और बढ़ाएगा। पाकिस्तान जैसे देशों के लिए अब तटस्थ रहना मुश्किल होता जा रहा है। अगर इजराइल लेबनान के बाद सीधे ईरान पर हमला करता है, तो पाकिस्तान की चुप्पी टूट सकती है।

ईरान और पाकिस्तान के बीच बढ़ता ये सैन्य संवाद केवल एक कॉल तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले हफ्तों में हमें उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडलों के दौरे देखने को मिल सकते हैं। नजर इस बात पर रखनी होगी कि क्या पाकिस्तान ईरान के साथ कोई नया सुरक्षा समझौता करता है या फिर अमेरिका के दबाव में आकर दूरी बना लेता है।

अगर आप इस क्षेत्र की राजनीति को समझना चाहते हैं, तो बस इन तीन चीजों पर नजर रखें—ईरान की सीमा पर सैन्य हलचल, पाकिस्तान की सेना का आधिकारिक बयान और अमेरिका का पाकिस्तान को मिलने वाला फंड। इन्हीं में भविष्य के संकेत छिपे हैं।

SR

Savannah Russell

An enthusiastic storyteller, Savannah Russell captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.