ईरान और हॉर्मुज संकट पर मैक्रों और सऊदी प्रिंस का साझा प्रहार

ईरान और हॉर्मुज संकट पर मैक्रों और सऊदी प्रिंस का साझा प्रहार

ईरान की समुद्री दादागिरी अब बर्दाश्त से बाहर हो रही है। जब इमैनुएल मैक्रों और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) एक कमरे में बैठते हैं, तो उसका मतलब सिर्फ औपचारिकता नहीं होता। इस बार सीधा संदेश तेहरान को गया है। फ्रांस और सऊदी अरब ने मिलकर साफ कर दिया है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) किसी की जागीर नहीं है। यह समुद्री रास्ता ग्लोबल इकोनॉमी की लाइफलाइन है और अगर ईरान ने यहाँ अपनी हरकतें बंद नहीं कीं, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

हॉर्मुज पर ईरान का पुराना खेल अब नहीं चलेगा

दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान अक्सर इस रास्ते को बंद करने की धमकी देकर पश्चिमी देशों और खाड़ी देशों को ब्लैकमेल करता रहा है। लेकिन मैक्रों और MBS की इस मुलाकात ने खेल बदल दिया है। सऊदी अरब अब सिर्फ अमेरिका के भरोसे नहीं बैठा है। वह फ्रांस जैसे यूरोपीय पावरहाउस के साथ मिलकर एक नया सुरक्षा घेरा तैयार कर रहा है।

ईरान की रणनीति हमेशा से 'ग्रे ज़ोन' में रही है। वह सीधे युद्ध नहीं करता, बल्कि टैंकरों को पकड़ना, माइन्स बिछाना या अपने प्रॉक्सी संगठनों के जरिए तनाव फैलाना पसंद करता है। मैक्रों ने पेरिस में हुई इस बैठक में जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन अब बर्दाश्त नहीं होगा। हॉर्मुज में नेविगेशन की स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है।

फ्रांस और सऊदी का यह तालमेल क्यों मायने रखता है

सऊदी अरब के लिए यह उसकी 'विज़न 2030' की सुरक्षा का सवाल है। अगर हॉर्मुज असुरक्षित होता है, तो सऊदी का व्यापारिक भविष्य खतरे में पड़ जाता है। दूसरी तरफ, फ्रांस खुद को मध्य पूर्व में एक निष्पक्ष लेकिन मजबूत मध्यस्थ के रूप में देख रहा है। वह अमेरिका की तरह आक्रामक नहीं दिखना चाहता, लेकिन अपनी नौसैनिक शक्ति के जरिए यह जरूर बताना चाहता है कि यूरोप इस क्षेत्र से पीछे नहीं हटा है।

मैक्रों और MBS के बीच यह सहमति केवल शब्दों तक सीमित नहीं है। इसमें रक्षा सहयोग और खुफिया जानकारी साझा करने की गहरी परतें शामिल हैं। सऊदी अरब अब अपने हथियारों के भंडार के लिए सिर्फ वॉशिंगटन की तरफ नहीं देख रहा। राफेल लड़ाकू विमानों और फ्रांसीसी रडार सिस्टम पर उनकी बढ़ती दिलचस्पी बताती है कि वे ईरान को घेरने के लिए एक मल्टी-पोलर रणनीति अपना रहे हैं।

प्रॉक्सी वॉर और क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रहार

ईरान की ताकत उसके परमाणु कार्यक्रम से ज्यादा उसके प्रॉक्सी नेटवर्क में है। यमन में हूतियों से लेकर लेबनान में हिजबुल्लाह तक, तेहरान ने हर जगह अपने पंजे फैलाए हैं। सऊदी क्राउन प्रिंस ने मैक्रों को स्पष्ट किया कि जब तक इन नेटवर्क की फंडिंग और हथियारों की सप्लाई नहीं रुकती, हॉर्मुज का रास्ता कभी सुरक्षित नहीं होगा।

हूती विद्रोही जिस तरह से लाल सागर और हॉर्मुज के पास जहाजों को निशाना बनाते हैं, वह सीधे तौर पर ईरान के इशारे पर होता है। फ्रांस ने इस मुद्दे पर सऊदी का समर्थन करके यह संकेत दिया है कि अब यूरोपीय यूनियन भी ईरान पर सख्त प्रतिबंधों के पक्ष में खड़ा हो सकता है। यह ईरान के लिए एक बड़ा राजनयिक झटका है क्योंकि वह हमेशा से यूरोप को अमेरिका से अलग करने की कोशिश करता रहा है।

क्या ईरान पीछे हटेगा या तनाव और बढ़ेगा

ईरान के पास फिलहाल खोने के लिए बहुत कुछ है। उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही प्रतिबंधों के बोझ तले दबी है। लेकिन तेहरान की फितरत दबाव में झुकने के बजाय और अधिक आक्रामक होने की रही है। जब मैक्रों और MBS जैसे बड़े नेता एक साथ आते हैं, तो ईरान के कट्टरपंथी धड़े इसे उकसावे के तौर पर देखते हैं।

ईरान का दावा है कि हॉर्मुज उसकी सीमा का हिस्सा है और वह वहां सुरक्षा के नाम पर किसी भी जहाज की जांच कर सकता है। लेकिन हकीकत में, यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र है। फ्रांस और सऊदी का साझा बयान इसी 'वैधता' को चुनौती देता है। अगर कल को फ्रांस और सऊदी अरब की नौसेनाएं मिलकर पेट्रोलिंग शुरू करती हैं, तो ईरान के लिए अपनी दादागिरी दिखाना मुश्किल हो जाएगा।

तेल की कीमतों पर पड़ने वाला असर

जब भी हॉर्मुज में हलचल होती है, कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह नया गठबंधन बाजार को शांत रख पाएगा। मैक्रों और MBS जानते हैं कि स्थिरता ही एकमात्र रास्ता है। सऊदी अरब अपनी तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखकर ग्लोबल मार्केट में अपनी साख बचाना चाहता है, जबकि फ्रांस को अपनी घरेलू ऊर्जा कीमतों को काबू में रखना है।

इस रणनीतिक तालमेल का असर सिर्फ खाड़ी तक सीमित नहीं रहेगा। यह भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातकों के लिए भी राहत की खबर हो सकती है, जो इस रास्ते की सुरक्षा पर निर्भर हैं। हालांकि, ईरान इसे 'विदेशी हस्तक्षेप' करार देकर अपनी जनता को एकजुट करने की कोशिश जरूर करेगा।

आगे क्या करने की जरूरत है

ईरान की चुनौती से निपटने के लिए अब केवल कूटनीति काफी नहीं है। फ्रांस और सऊदी अरब को अपने सैन्य सहयोग को ज़मीनी स्तर पर उतारना होगा। इसमें जॉइंट नेवल एक्सरसाइज और हॉर्मुज के आसपास एक परमानेंट सर्विलांस सिस्टम बनाना शामिल है।

आप अगर इस क्षेत्र के घटनाक्रमों पर नजर रख रहे हैं, तो कुछ चीजें स्पष्ट हैं। पहला, अमेरिका अब मध्य पूर्व का इकलौता खिलाड़ी नहीं रहा। दूसरा, क्षेत्रीय ताकतें जैसे सऊदी अरब अब अपनी सुरक्षा के लिए खुद फैसले ले रही हैं। ईरान को अगर अपनी अर्थव्यवस्था बचानी है, तो उसे अपनी 'टैंकर डिप्लोमेसी' छोड़नी होगी।

ईरान की हरकतों पर लगाम कसने का सबसे कारगर तरीका उसकी आर्थिक सप्लाई लाइन को काटना है। मैक्रों और MBS ने इसकी शुरुआत कर दी है। अब देखना यह है कि तेहरान इस घेरेबंदी का जवाब किस तरह देता है। अगर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो हॉर्मुज में जलने वाली चिंगारी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झुलसा सकती है।

अब वक्त आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस साझा गठबंधन का समर्थन करे ताकि ग्लोबल ट्रेड सुरक्षित रहे। समुद्री डकैती और राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के बीच का अंतर खत्म हो चुका है, और इसे रोकने के लिए ताकत का प्रदर्शन ही एकमात्र विकल्प बचा है।

IL

Isabella Liu

Isabella Liu is a meticulous researcher and eloquent writer, recognized for delivering accurate, insightful content that keeps readers coming back.